Bhumihar's - in History !!

Posted by Prabhat Ranjan on May 26, 2013 at 12:10 AM

 

भूमिपति ब्राह्मणों के लिए पहले जमींदार ब्राह्मण शब्द का प्रयोग होता था..याचक ब्राह्मणों के एक दल ने ने विचार किया की जमींदार तो सभी जातियों को कह सकते हैं,फिर हममे और जमीन वाली जातियों में क्या फर्क रह जाएगा.काफी विचार विमर्श के बाद ” भूमिहार ” शब्द अस्तित्व में आया.” भूमिहार ब्राह्मण ” शब्द के प्रचलित होने की कथा भी बहुत रोचक .

बनारस के महाराज ईश्वरी प्रसाद सिंह ने १८८५ में बिहार और उत्तर प्रदेश के जमींदार ब्राह्मणों की एक सभा बुलाकर प्रस्ताव रखा की हमारी एक जातीय सभा होनी चाहिए.सभा बनाने के प्रश्न पर सभी सहमत थे.परन्तु सभा का नाम क्या हो इस पर बहुत ही विवाद उत्पन्न हो गया.मगध के बाभनो ने जिनके नेता स्व.कालीचरण सिंह जी थे ,सभा का नाम ” बाभन सभा ” करने का प्रस्ताव रखा.स्वयं महराज “भूमिहार ब्राह्मण सभा ” के पक्ष में थे.बैठक मैं आम राय नहीं बन पाई,अतः नाम पर विचार करने हेतु एक उपसमिति गठित की गई.सात वर्षो के बाद समिति की सिफारिश पर ” भूमिहार ब्राह्मण ” शब्द को स्वीकृत किया गया और साथ ही साथ इस शब्द के प्रचार व् प्रसार का काम भी हाथ में लिया गया.इसी वर्ष महाराज बनारस तथा स्व.लंगट सिंह जी के सहयोग से मुजफ्फरपुर में एक कालेज खोला गया.बाद में तिरहुत कमिश्नरी के कमिश्नर का नाम जोड़कर इसे जी.बी.बी. कालेज के नाम से पुकारा गया.आज वही कालेज लंगट सिंह कालेज के नाम से प्रसिद्द है.

गुजरात में अयाचक ब्राह्मण

गुजरात में अयाचक ब्राह्मणों की एक और कोटि है जिसे ” औदिच्य ” कहते है.ये ब्राह्मण राजा मूलराज के आमंत्रण पर दशवी शताब्दी में उत्तर भारत से गुजरात चले गए थे.उत्तर से आने के कारण इन्हें ” औदिच्य ” कहा जाता है. स्वामी दयानंद सरस्वती ” औदिच्य ब्राह्मण ” ही थे.

एक महत्वपूर्ण जानकारी हमसबके लिए

भूमिहार ब्राह्मणों के इतिहास को पढने से पता चलता है की अधिकांश समाजशास्त्रियों ने भूमिहार ब्राह्मणों को कान्यकुब्ज की शाखा माना है.भूमिहार ब्राह्मन का मूलस्थान मदारपुर है जो कानपुर – फरूखाबाद की सीमा पर बिल्हौर स्टेशन के पास है..१५२८ में बाबर ने मदारपुर पर अचानक आक्रमण कर दिया.इस भीषण युद्ध में वहा के ब्राह्मणों सहित सबलोग मार डाले गए.इस

हत्याकांड से किसी प्रकार अनंतराम ब्राह्मण की पत्नी बच निकली थी जो बाद में एक बालक को जन्म दे कर इस लोक से चली गई.इस बालक का नाम गर्भू तेवारी रखा गया.गर्भू तेवारी के खानदान के लोग कान्यकुब्ज प्रदेश के अनेक गाँव में बसते है.कालांतर में इनके वंशज उत्तर प्रदेश तथा बिहार के विभिन्न गाँव में बस गए.गर्भू तेवारी के वंशज भूमिहार ब्रह्मण कहलाये .इनसे वैवाहिक संपर्क रखने वाले समस्त ब्राह्मण कालांतर में भूमिहार ब्राह्मण कहलाये.

एक महत्वपूर्ण घटना – कृपया ध्यान से पढ़े.

बनारस के अन्नपूर्णा मंदिर में एक बार भागवत की कथा एक भूमिहार ब्राह्मण महोदय ने प्रारंभ की.वहा पर उपस्थित कुछ लोगो ने उनपर मुक़दमा किया की इस स्थान पर केवल ब्राह्मन ही कथा कह सकता है,भूमिहार नहीं.मुक़दमा चला,जिसमे प्रसिद्द भाषाविद श्री सुनीति कुमार चत्तेर्जी,आचार्य हजारी प्रसाद देवेदी,श्री किशोरी दास वाजपेयी,श्री वेंकटेश न

ारायण तेवारी,श्री बनारसी दस चतुर्वेदी, आदि दिग्गज हस्तियों ने गवाही दी थी.माननीय न्यायाधीश महोदय ने अपने फैसले में कहा जब सम्पूर्ण भारत के लोग भूमिहार को शुद्ध ब्राह्मण मानते है तो यहाँ के थोड़े से ब्राह्मण किस प्रकार नहीं मानते.फैसले में आगे लिखा है की “ये लोग शुद्ध ब्राह्मण है.” काशिराज,द्विजराज महामहिम की उपाधि बनारस महाराजा को सैकड़ों वर्षो से प्राप्त है

अंग्रेजो ने यहाँ के सामाजिक स्तर का गहनadhyayan कर अपने गजेतिअरों एवं अन्य पुस्तकों में भूमिहारो के उपवर्गों का उल्लेख किया है.gahadwal काल के बाद मुसलमानों से त्रस्त भूमिहार ब्राह्मन ने जब कान्यकुब्ज क्षेत्र से पूर्व की ओर पलायन प्रारंभ किया और अपनी सुविधानुसार यत्र तत्र बस गए तो अनेक उपवर्गों के नाम से संबोधित होने लगे,यथा – ड्रोनवार ,गौतम,कान्यकुब्ज,जेथारिया आदि.अनेक कारणों,अनेक रीतियों से उपवर्गों का नामकरण किया गया.कुछ लोगो ने अपने आदि पुरुष से अपना नामकरण किया और कुछ लोगो ने गोत्र से.कुछ का नामकरण उनके स्थान से हुवा जैसे – सोनभद्र नदी के किनारे रहने वालो का नाम सोन भरिया, सरस्वती नदी के किनारे वाले सर्वारिया,,सरयू नदी के पार वाले सरयूपारी,आदि.मूलडीह के नाम पर भी कुछ लोगो का नामकरण हुआ जैसे,जेथारिया,हीरापुर पण्डे,वेलौचे,मचैया पाण्डे,कुसुमि तेवरी,ब्र्हम्पुरिये ,दीक्षित ,जुझौतिया ,आदि.

उपर्युक्त दृष्टान्त प्रो.वासुकिनाथ प्रसाद सिंह जी की पुस्तक से लिया गया है.ये सब उनलोगों के लिए खास तौर से है जो आज भी अपने को केवल भूमिहार या ठाकुर कहने में गर्व का अनुभव करते है.ये बात उनलोगों के लिए भी है जो यह दलील अक्सर देते हुए दिखाई देते है की ब्राह्मण हमें ब्राह्मण नहीं मानता.किसी के मानने या न मानने से हमारा अस्तित्व नहीं प्रभावित होता है.पहले हम स्वयं को ब्राह्मन कहना शुरू करें तभी और लोग भी हमें ब्राह्मन कहेंगे.यदि हम अपना नाम घुरहू कहेंगे तो दूसरे को क्या पड़ी है,वो भी हमें घूरहू ही पुकारेगा

सकरवार – एक ऐतिहासिक परिदृष्टि

१७ मार्च १५२७ में खानवा के मैदान में बाबर का मुकाबला राणा संग ने राजपूत राजाओं,अफगानों तथा कान्यकुब्ज ब्राह्मणों ( काम मिश्र व् धाम मिश्र) को साथ लेकर किया.युद्ध में बाबर की सेना ने सबको परस्त किया और बहुत लोग मौत के घाट उतार दिए गए..जो ब्राह्मण शेष बचे वो पूर्व क्षेत्र काशी की तरफ पलायन किये और गाजीपुर,गोरखपुर,आजमगढ़ देओरिया,हरदोई तथा बिहार के कई

जनपदों में जा कर बस गए.इन क्षेत्रों में जो भी ब्राह्मण है उनमे अधिकांश ब्राह्मणों की शाखा है जो सकरवार ,किन्वार,दोनवार ,कसतुवार आदि के अनेक गोत्रज है.

स्वामी सहजानंद सरस्वती के अनुसार सकरवार नाम वाले कान्यकुब्ज ब्राह्मण संकृति गोत्र वाले फतुहाबाद जिला फतेहपुर के मिश्र है,जो मुस्लिम शासन काल में फतुहाबाद से आकर प्रथम रेवतीपुर,गहमर,करहिया ,आदि गाँव में बस गए.बाद में इनका यही से विस्तार हुआ है.

द्रोणवार – एक ऐतिहासिक परिदृष्टि

भूमिहारों का अस्तित्व कम से कम मौर्यकाल से मिलता है.यह अयाचक ब्राह्मणों की जाति है.यह तेजस्वी अयाचक ब्राह्मणों की प्रजाति है.असल में बौद्धों का भौगोलिक क्षेत्र ,भूमिहार का वर्तमान भौगोलिक क्षेत्र है.इसी भूभाग में मुख्यतः यह अयाचक ब्राह्मणों की प्रजाति बिखरी हुई थी.ईशा की पहली सहस्राब्दी के उतरार्ध में इस प्रजाति के ब्राह्मणों ने पतानो

ंमुख बौद्ध संघयम की अकूत सम्पदा हथिया ली.यह वर्ग अपने प्रभुत्व में ग्रहण करने वाला वर्ग है.

श्री वासुकिनाथ प्रसाद सिंह जी के अनुसन्धान से उनकी पुस्तक ” द्रोणवार – एक ऐतिहासिक परिदृष्टि ” से यह स्पस्ट होता है की द्रोणवार से तात्पर्य द्रोण वंशीय ब्राह्मणों से है.यानि आचार्य द्रोण की वंश परंपरा के शेष लोगो से जिन्होंने महाभारत युद्ध के बाद उनका क्रियाकर्म किया था.

भूमिहार ब्राह्मण महासभा

१.सन १८८५ में भूमिहार ब्राह्मण महासभा की स्थापना काशी नरेश महाराज इश्वरी नारायण सिंह के प्रयास से वाराणसी में हुई.इसी सभा में मगध के बाभनो,मिथिलांचल के पश्चिमा और अन्य भूमिहार ब्राह्मणों से सम्बन्ध करने वाले ब्राह्मणों को भूमिहार ब्राह्मण संगठन में सम्मिलित किया गया.काशी नरेश.बराओं,तमकुही,मकसू

दपुर थाका तथा सर गणेश दत्त सिंह,स्वामी हन्सानंद सरस्वती,स्वामी सहजानंद सरस्वती,स्वामी पूर्णानंद सरस्वती,स्वामी वासुदेवाचार्य ,आदि के प्रयासों से महासभा का कार्य चलता रहा.सन १९२८ में ये सभा समाप्त हो गई.

सन १९०१ में भूमिहार ब्राह्मण नामक पत्र कशी,बराओं,हापरा मुजफ्फरपुर से पंडित श्याम चरण शर्मा के संपादकत्व में निकला.काशी से बंद हो जाने के बाद कलकत्ता से पंडित जय नारायण शर्मा ने कुछ दिन ये पत्र निकला.

भूमिहार ब्राह्मण महासभा में केवल वार्षिक अधिवेसन होते रहे और प्रस्ताव पास होते रहे,न कुरीतियाँ मिटी और न विषमता समाप्त हुई.स्वामी सहजानंद का पुरोहिती वाला प्रस्ताव समाज के बड़े लोगो के प्रबल वोरोध के बाद पास हो सका.स्वामी जी अशनतुस्त हो कर चले आये.बाद में उन्होंने किसान सभा बना ली.महासभा के कार्यकर्ता ही स्वामीजी के साथ किसान सभा के कार्यकर्ता हो गए.

२. सन १९३८ में पंडित शिवनंदन राय (सुहबल) अधिवक्ता ,पटना तथा मुनीश्वर राय शर्मा (रामपुर) पत्रकार के प्रयासों से पटना में जगतगंज के रईस श्री कविन्द्र नारायण सिंह की अध्यांश्ता में सभा हुई.

३. सन १९४४ में बक्सर में कुंवर सूर्यनारायण सिंह और राजेश्वर पण्डे के प्रयत्नों से एक सभा हुई.

४.सन १९४५ में बलिया में डा.मुंजे (चितपावन ब्राहमण ) की अध्यक्षता में सभा हुई.

५. सन १९४७ में पटना है कोर्ट के जुडगे श्री वशिस्थ नारायण राय की अध्यक्षता में अधिवेसन हुआ.

इसके बाद भारत के आज़ाद होने के बाद भूमिहार ब्राह्मण सभा का तिरोधाम हो गया.यदि अयोध्या में एक महंत की गद्दी के

लिए भूमिहार ब्राह्मण बनाम सरयूपारी ब्राह्मण का संघर्ष नहीं हुआ होता तो शायद हमलोग अभी भी शुशुप्ता अवस्था में ही पड़े रहते.

 

 

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